​पालिका का आदेश ठेंगे पर नहीं थम रहा है कूड़ा जलाने का दौर ….

★जुर्माने का खौफ नहीं है आम जनता में
★सुबह होते ही जगह-जगह कूड़े में लगाई जाती आग

★पर्यावरण के लिए बनता जा रहा है खतरा

उरई (जालौन) कुलदीप मिश्रा : शहर से लेकर गांव तक की तस्वीर बदलने के लिए ग्रीन ट्रिब्यूनल द्वारा विशेष निर्देश जारी किए गए कि कोई भी व्यक्ति घर के बाहर कूड़ा नहीं डालेगा और न ही उसे जलाएगा। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में किसान अपशिष्ट को खेतों में आग लगाकर नष्ट नहीं करेगा परंतु इन आदेशों का कहीं कोई पालन होता नजर नहीं आ रहा है जबकि इस पर शासन द्वारा जुर्माने का प्रावधान किया गया। वहीं पालिका ने निर्देश भी जारी कर दिए लेकिन इनके निर्देशों का स्वयं इनके कर्मचारी पालन नहीं कर रहे हैं।

जिलाधिकारी संदीप कौर ने विगत दिनों प्रेस विज्ञप्ति के माध्यम से अवगत कराया था कि जनपद में कोई भी किसान अपने खेतों में आग नहीं लगाएगा अन्यथा की स्थिति में उसके खिलाफ कार्रवाई की जाएगी। इतना ही नहीं नगर पालिका अधिशाषी अधिकारी ने भी आदेश किए थे कि घर का कूड़ा बाहर न फेेंकेें और कूड़े में आग न लगाएं परंतु सुबह शहर का अधिकांश कूड़ा लोगों द्वारा जलाया जाता है या फिर पालिका द्वारा बनाई गई नालियों में भर दिया जाता है जिससे विभिन्न-विभिन्न तरह के कीटाणु उत्पन्न हो जाते हैं जो स्वास्थ्य के लिए खतरनाक बन जाते हैं। सर्राफा से लेकर घंटाघर एवं अन्य जगह की नालियों में यह नजारा आम देखा जा सकता है। दुकानदारों का जो भी कूड़ा निकलता है उसमें वह एकत्रित करके आग लगा देते हैं। अब तक नगर पालिका द्वारा किसी पर कोई कार्रवाई नहीं की गई है। कागज का आदेश कागजों में ही सीमित होकर रह गया है जबकि पालिका में सफाई कर्मियों की लंबी-चौड़ी फौज है। वहीं ग्रामीण क्षेत्रों में सफाई कर्मी तैनात हैं फिर भी लोग शौच के लिए बाहर जाते हैं जबकि टीवी से लेकर अन्य माध्यमों से स्वच्छता अभियान को लेकर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। इससे कितनी हानियां हैं यह भी दर्शार्ई जा रही हैं। शाम-सुबह महिला बुजुर्ग और लड़कों की गांव व शहर के बाहरी क्षेत्रों में शौच के लिए लंबी-लंबी लाइनें लगी रहती हैं अगर ग्रामीण क्षेत्रों का सर्वे कराया जाए तो जो शौचालय के लिए धनराशि शासन द्वारा दी गई है उसका अस्सी प्रतिशत दुरुपयोग हुआ है और बीस प्रतिशत ऐसे लोग होंगे जिन्होंने स्वच्छता अभियान स्वीकार किया है जबकि देश के प्रत्येक व्यक्ति की जेब स्वच्छता अभियान के लिए ढीली की जा रही है। इसके लिए अलग से टैक्स की व्यवस्था कर दी गई है। करोड़ों रुपए केेंद्र सरकार के खाते में जा रहे हैं लेकिन स्वच्छता का माहौल कहीं नजर नहीं आता है। आखिरकार इन निर्देशों का पालन क्यों नहीं कराया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रधान सचिव अगर अपनी जिम्मेदारी का ठीक ढंग से निर्वाह करने लगें तो यह अभियान सफल हो सकता है। वहीं ग्रामीण से लेकर शहर के बाहरी क्षेत्रों में सड़क के किनारे कूड़े के बड़े-बड़े डंप लगे रहते हैं। कंडे और गोबर पड़े रहते हैं। उनके जानवर रोड घेरे खड़े हुए हैं जिससे गंदगी उत्पन्न होती है। इसको लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई है। जब यह अभियान प्रारंभ हुआ था तो कलेक्टर से लेकर सफाई कर्मी देश के प्रधानमंत्री हाथ में झाड़ू लेकर खड़े हो गए थे। समय गुजरते ही यह अभियान सिर्फ दिखावे के लिए रह गया है और जो धनराशि स्वच्छता अभियान के लिए आई वह बंदरबांट होती जा रही है। वास्तविकता यह है कि शहर और गांव दोनों ही जस की तस स्थिति में पड़े हुए हैं। हां जो बजट आया था उसकी जरूरत सफाई की जा रही है और कागजों में स्वच्छता अभियान भरपूर दिखाई पड़ रहा है। वास्तविकता इससे हटकर है।

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