“सच बोलकर ‘मगर’ से बैर तो लिया है वर्षा तूने”


(सौजन्य @ उत्तम कुमार)

वकील व कानूनी जानकार न होते हुए भी इतना तो जाना है कि वर्षा आपने छत्तीसगढ़ आचरण नियम, 1965 नियम 10 (3) में शासकीय सेवक का कृत्य उसके पदीय हैसियत में अथवा उसे सौंपे गए कर्तव्यों के सम्यक पालन में होना चाहिए इसका उल्लंघन करते हुए उस मामले का हल सुझाया है जो आदिवासियों के हित में है, जो वहां के महिलाओं के अस्मिता से जुड़ा है जो वाकई में वहां शांति स्थापित करने की राह दिखाता है-आप अगर इन वाक्यों को सही मानते हैं जो छत्तीसगढ़ सहित देश और दुनिया में पसर रहा है कि -‘हम सभी को अपने गिरेबान में झांकना चाहिए, सच्चाई खुद ब खुद सामने आ जाएगी। घटना में दोनों तरफ मरने वाले अपने देशवासी हैं। इसलिए कोई भी मरे तकलीफ हम सबको होती है. लेकिन पूंजीवादी व्यवस्था को आदिवासी क्षेत्रों में जबरदस्ती लागू करवाना उनकी जल, जंगल, जमीन से बेदखल करने के लिए गांव का गांव जला देना, आदिवासी महिलाओं के साथ बलात्कार, आदिवासी महिलाएं नक्सली हैं या नहीं, इसका प्रमाण पत्र देने के लिए उनको स्तन निचोडक़र देखा जाता है।
टाईगर प्रोजेक्ट के नाम पर आदिवासियों को जल जंगल जमीन से बेदखल करने की रणनीति बनती है, जबकि संविधान के  5 वीं अनुसूची में शामिल होने के कारण सरकार को कोई हक नहीं बनता आदिवासियों के जल जंगल और जमीन को हड़पने का। आखिर ये सब कुछ क्यों हो रहा है? सच तो यह है कि सारे प्राकृतिक खनिज संसाधन इन्हीं जंगलों में हैं, जिसे उद्योगपतियों और पूंजीपतियों को बेचने के लिए खाली करवाना है। आदिवासी जल जंगल जमीन खाली नहीं करेंगे क्योंकि यह उनकी मातृभूमि है।मैंने स्वयं बस्तर में 14 से 16 वर्ष की मुडिय़ा माडिय़ा आदिवासी बच्चियों को देखा था, जिन्हें थाने में महिला पुलिस को बाहर कर पूरा नग्न कर प्रताडि़त किया गया था। उनके दोनों हाथों की कलाईयों और स्तनों पर करंट लगाया गया था, जिसके निशान मैंने स्वयं देखे। मैं भीतर तक सिहर उठी थी कि इन छोटी-छोटी आदिवासी बच्चियों पर थर्ड डिग्री टार्चर किसलिए? यह जवाब तो आज तक राज्य सहित केन्द्र सरकार के पास भी नहीं है। 
बस्तर के लोहंडीगुडा में 2044 हेक्टेअर में बनने वाला टाटा का स्टील प्लांट का इकरारनमा 6 जून, 2005 से 4-5 नवीनीकरण के बावजदू 2016 में रद्द करना पड़ा, यही हाल अन्य  इकरारनामों का भी है। आदिवासियों ने जिस तरह से अंग्रेजों की गुलामी को नहीं स्वीकारा  उसी तरह वह देशी-विदेशी पूंजीपतियों की गुलामी को स्वीकार नहीं करना चाहते। सन् 2004 में सलवा जुडूम चलाया गया जिसमें 650 गांव को जला दिया गया, महिलाओं से बलात्कार किया गया, सैकड़ों लोगों को मार दिया गया, लाखों लोग गांव छोडऩे पर मजबूर हुए, हजारों लोगों को उनके गांव से उठाकर कैम्पों में रखा गया जिसका खर्च टाटा और एस्सार जैसी कम्पनियों ने उठाया। सरकार द्वारा गठित कमेटी का कहना है कि कोलम्बस के बाद जमीन हड़पने का सलवा जुडूम सबसे बड़ा अभियान था। गृहमंत्री चिदम्बरम द्वारा आदिवासी इलाकों में माओवादियों के सफाए के लिए ऑपरेशन ग्रीन हंट चलाया गया। इस अभियान के तहत काफी संख्या में सीआरपीएफ, सीआईएसएफ, बीएसएफ, कोबरा, नागालैंड, भारत तिब्बत सीमा पुलिस, ग्रे हाउंड भिन्न-भिन्न तरह के अर्धसैनिक बल के जवानों को आदिवासी ईलाकों में भेजा गया।
30 अक्टूबर, 2015 को राष्ट्रीय स्तर की महिलाओं का एक दल जगदलपुर और बीजापुर गया था। इस दल को पता चला कि 19/20 से 24 अक्टूबर, 2015 के बीच बासागुडा थाना अन्तर्गत चिन्न गेल्लूर, पेदा गेल्लूर, गुंडुम और बुडग़ी चेरूगांव में सुरक्षा बलों ने जाकर गांव की महिलाओं के साथ यौनिक हिंसा और मारपीट की। पेदागेल्लूर और चिन्ना गेल्लूर गांव में ही कम से कम 15 औरतें मिलीं, जिनके साथ यौन हिंसा की वारदातें हुई थीं। इनमें से 4 महिलायें जांच दल के साथ बीजापुर आईं और कलेक्टर, पुलिस अधीक्षक व अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के समक्ष अपना बयान दर्ज कराया। इन महिलाओं में एक 14 साल की बच्ची तथा एक गर्भवती महिला थीं, जिनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया था। गर्भवती महिला के साथ नदी में ले जाकर कई बार सामूहिक बलात्कार किया गया। महिलाओं के स्तनों को निचोड़ा गया, उनके कपड़े फाड़ दिए गए। 
15 जनवरी, 2016 को सीडीआरओ (मानवाधिकार संगठनों का समूह) और डब्ल्यूएसएस (यौन हिंसा और राजकीय दमन के खिलाफ महिलाएं) की टीम छत्तीसगढ़ आई थी। इस टीम का अनुभव भी अक्टूबर में गई टीम जैसा ही था। 11 जनवरी, 2016 को सुकमा जिले के कुकानार थाना के अन्तर्गत ग्राम कुन्ना गांव के पहाडिय़ों पर ज्वांइट फोर्स (सीआरपीएफ, कोबरा, डीआरजी, एसपीओ) के हजारों जवानों ने डेरा डाल रखा था। कुन्ना गांव में पेद्दापारा, कोर्मा गोंदी, खास पारा जैसे दर्जन भरपारा हैं। यह गांव मुख्य सडक़ से करीब 15-17 किमी.अन्दर है और गांव के लोगों को सडक़ तक पहुंचने के लिए 3 घंटे लगते हैं। 12 जनवरी, 2016 को सुरक्षा बलों, एसपीओ और जिला रिजर्व फोर्स के जवानों ने गांव को घेर लिया। महिलाओं ने सोनी सोरी के नेतृत्व में बस्तर संभाग के कमिश्नर के पास शिकायत की। 
सुकमा जिले के कोटा थाना अन्तर्गत गोमपाड़ गांव में 13 जून, 2016 को घर से मडक़म हिड़मे को उठाकर अर्धसैनिक बल के जवान ले गए और दुष्कर्म करने के बाद हत्या कर दिया गया, उसको काली वर्दी पहनाकर और एक भरमार बंदूक रखकर माओवादी बतलाने की कोशिश की गई। हालांकि ये मामला अभी कोर्ट में चल रहा है। राष्ट्रीय मीडिया में यह खबर तब आती है जब बीजापुर के सारकेगुड़ा जैसी घटना होती है जिसमें 17 ग्रामीणों को (इसमें 6 बच्चे थे) मौत की नींद सुला दी जाती है या ताड़मेटला या उड़ीसा के मलकानगीरी जैसी घटना होती है। इस खबर पर रायपुर से लेकर दिल्ली तक यह कह कर खुशियां मनाई जाती है कि बहादुर जवानों को बड़ी सफलता मिली है।बार-बार यह सवाल उठता है कि सुरक्षा बल के जवान मारे जाते हैं तो सरकार, पुलिस अधिकारी, तथाकथित देशभक्त मानवाधिकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं को कोसते हैं। उनसे सवाल किया जाता है कि वह इस घटना की निन्दा क्यों नहीं कर रहे हैं।
सरकार भूल जाती है कि जनता नक्सलियों को नहीं इस सरकार और उनके नुमाइंदे और अपनी रक्षा के लिए सुरक्षा बल को शक्ति प्रदान किया है। मानवाधिकार, सामाजिक कार्यकर्ताओं का काम है कि सरकार की गलती को दिखाना, उनके चाहने से शांति कायम नहीं हो सकती, शांति के लिए सरकार को पहल करनी होगी। मार्च 2011 के पुलिस ने तीन गांव तिम्मापुर, ताड़मेटला और मोरपल्ली के 250 घरों को जला दिया गया था और इस दौरान तीन व्यक्ति मारे गए और कई महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया। इस मामले में सीबीआई द्वारा सात विशेष पुलिस अधिकारियों के खिलाफ चार्जशीट दायर की गई है। सीबीआई ने कहा कि इस त्रासदी में 323 विशेष पुलिस अधिकारियों, पुलिसकर्मियों और सीआरपीएफ तथा कोबरा के 95 कर्मियों के शामिल होने के सबूत सामने आया है। सरकार मानवाधिकार हनन के इन तमाम घटनाओं पर कभी सार्वजनिक माफी नहीं मांगी?
सुकमा के कलेक्टर अलेक्स पॉल मेनन के अपहरण पर सरकार और माओवादियों की बीच भी कुछ लोगों ने मध्यस्थता करवाई थी। इस अपहरण से उत्पन्न स्थिति को सुलझाने के लिए चार मध्यस्थों डॉ बीडी शर्मा और प्रोफेसर हरगोपाल, (सीपीआई (माओवादी) द्वारा मनोनीत) और निर्मला बुच और  एसके मिश्रा (जिन्हें छत्तीसगढ़ शासन के प्रतिनिधि) के बीच रायपुर में बैठक हुई। इस बैठक में अलेक्स पॉल मेनन को छुड़ाने के साथ-साथ दूसरी बात पर जो चर्चा हुई थी वह थी कि छत्तीसगढ़ के विभिन्न जेलों में न्यायिक हिरासत में बंद आदिवासियों की रिहाई। इसके लिए उच्चाधिकार प्राप्त स्थायी समिति का गठन किया गया समिति की अध्यक्ष निर्मला बुच थी। बाद में सरकार ने इस समिति की बात को अनसुना कर दिया गया।
हां वर्षा आप छत्तीसगढ़ आचरण नियम 1965 नियम 10 (4) देखिए जिसमें लिखा है कि सरकार की आलोचना अखिल भारतीय सेवा (आचरण) नियम, 1968 नियम 7 (i) छग आचरण नियम, 10 (i)   संवैधानिक वैधता-अधिनिर्धारित, शासकीय सेवक को वाक्स्वतंत्र्य और अभिव्यक्ति स्वतंत्रय तथा किसी वृत्ति या उपजीविका का अधिकार है-नियम 7 (i)  द्वारा लागू प्रतिबंध अनुच्छेद 19 (2) नहीं रोकता क्योंकि सरकार की नीति की प्रत्येक आलोचना लोक व्यवस्था को प्रभावित नहीं करती-तथापि अनुच्छेद 19 (6) इस नियम का निवारण करता है क्योंकि नियम में लगाए प्रतिबंध को लोकहित में कहा जा सकता है। नियम 7 (i) छग आचरण नियम, 10 (i)  का अर्थ यह लगाया जाएगा कि शासकीय सेवक सेवा शर्तों से संबंधित मामलों पर शिकायतों पर संगम द्वारा सरकार की आलोचना कर सकते हैं किन्तु सरकार की ऐसी नीतियों या कृत्यों के बारे में जो उनसे संबंधित न हों, ऐसा नहीं कर सकते। पर अवश्य ही गौर करिए। 
आपने हल तो कुछ नहीं किया उलटे वर्षा डोंगरे को कटघरे में खड़ा कर दिया। इतिहास आपको कभी माफ नहीं करेगा। क्या सरकार वर्षा द्वारा इंगित किए गए अधिकारियों के खिलाफ सजा का प्रस्ताव लाएगी। क्या वहां युद्धविराम लागू करेगी। क्या आप वर्षा डोंगरे की बातों पर अमल करेंगे उनके द्वारा कही गई बातों पर कार्रवाई करेंगे? क्या आप उन आदिवासियों की राज लौटाते हुए वहां 5वीं, 6ठीं अनुसूची व पेसा कानून लाना चाहते हैं? आपको हरसंभव फौजी व पुलिस को बैरक में लाना होगा, उनका सिविल क्षेत्र में तैनाती घातक साबित होगा? आदिवासियों को कैम्प की जिंदगी जीने छोड़ दिया गया है उनकी आजादी छीन कर उन्हें गुलामों की तरह जिन्दगी जीने के लिये विवश किया गया है। अगर आपको शांति लानी है तो इन सभी लोगों की बातों पर अमल करना होगा। इस समस्या का हल दमन से नहीं बंधोपाध्याय कमेटी के प्रस्ताव से निकलेगी। नहीं तो बड़े ऑपरेशन के नाम से देशवासी मरते रहेंगे, जेलों में लोग सड़ते रहेंगे, आदिवासी गुलाम जैसी जिन्दगी जीने को विवश रहेंगे और यह जंग चलती रहेगी। फिलहाल आपको आदिवासियों से उनके साथ किए गए गलतियों के लिए सार्वजनिक रूप से माफी तो मांगनी ही चाहिए।

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