​स्वच्छता सर्वे रिपोर्ट पर उठ रहे सवाल, सीएसई ने भी जताई आपत्ति …

◆ सफाई कर्मियों की गरिमा की बात नही, शुद्रों की जरूरत आज भी


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान की पोल सीएसई के रिपोर्ट के बाद खुलने लगी है। स्वच्छता सर्वेक्षण रैकिंग में छत्तीसगढ़ पहले 10 में भी नहीं है। अंम्बिकापुर रैकिंग में 15वें स्थान में और छत्तीसगढ़ में पहले स्थान पर है, इस्पात नगरी भिलाई राज्य में दूसरे तथा रैकिंग में 54वें स्थान, एल्यूमीनियम बनाने वाला कोरबा राज्य में तीसरे तथा रैकिंग में 77वें स्थान पर दुर्ग राज्य में चौथे तथा रैकिंग में पच्चीसवें स्थान पर, स्पंज आयरन का जहर फैलाता रायगढ़ 104वें स्थान पर अर्थात छत्तीसगढ़ राज्य में 5वें स्थान पर है।

छत्तीसगढ़ का राजधानी रायपुर रैकिंग में 128वें स्थान अर्थात राज्य में छठवें स्थान पर आता है जहां टाटीबंध से लगे ग्रामीण क्षेत्र में कचरे को उठाकर सीधे मलबा स्थल (लैंडफिल) पर ले जाते हैं। जो कि कचरा संधारण की सबसे गलत तरीकों में गिना जाता है। आपको नहीं लगता कि औद्योगिक प्रदूषण फैलाते ये शहर रैकिंग में जगह कैसे बना लिए? अर्थात रैकिंग में पिछडऩे के बाद भी विभिन्न राज्यों के प्रतिनिधियों को पुरस्कृत किया गया और नामचीन प्रतिनिधि शर्म हया भूलकर पुरस्कार लेने दिल्ली दौड़े चले गए। यह बात तो बिल्कुल भी समझ में नहीं आई और तो और यहां के सफाई कर्मचारी अपने न्यूनतम वेतन को लेकर लगातार संघर्ष कर रहे हैं।
स्वच्छ भारत अभियान में स्वच्छता सर्वे की भी बात कही गई थी। लेकिन स्वच्छता सर्वे पर सवाल उठा रहा है। उसकी शुचिता और ईमानदारी पर प्रश्न चिह्न लग रहे हैं। राजनीतिक दल जहां शहरों को जानबूझकर निचली रैंकिंग देने की तोहमत मढ़ रहे हैं तो गैर सरकारी संगठन सर्वे के मापदण्डों और काम करने के तरीके पर ही आपत्ति जता रहे हैं।स्वच्छता सर्वे में इस बार प्रधानमंत्री मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी को 36वां स्थान मिला है। जबकि भाजपा शासित देश का सबसे स्वच्छ शहर मध्यप्रदेश की व्यावसायिक राजधानी माने जाने वाले इंदौर को चुना गया है। दूसरे नंबर पर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल को चुना गया है।
बिहार की राजधानी पटना को इस रैंकिंग में 262वें नंबर पर रखा गया है। इंदौर भारत का सबसे साफ शहर कैसे हो सकता है? क्या वाकई वाराणसी भुवनेश्वर से ज्यादा साफ है? लेह गंगटोक से ज्यादा गंदा कैसे हो सकता है? मुंबई और नवी मुंबई के बीच 20 पायदानों का फर्क क्यों है? ये कुछ ऐसे सवाल हैं जो इस वक्त नरेंद्र मोदी सरकार के आगे उठ रहे हैं। सरकार ने देश के 434 शहरों में स्वच्छता सर्वेक्षण कराया था, जो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ड्रीम प्रोजेक्ट स्वच्छ भारत अभियान से प्रेरित है।जदयू के मुख्य प्रवक्ता संजय सिंह ने सर्वे पर कहा कि अभी हाल ही में हुए गुरु गोविन्द सिंह जी के प्रकाशोत्सव के मौके पर पूरी दुनिया से लोग पटना आए थे। तब पटना की साफ-सफाई की तारीफ पूरी दुनिया में हुई थी।
लेकिन अचानक ऐसा क्या हो गया कि पटना 72वें स्थान से अचानक 262वें स्थान पर पहुंच गया। केंद्र सरकार बदले की भावना से काम कर रही है। वह राजधानी पटना को स्मार्ट सिटी नहीं बनने देना चाहती है। सफाई के मामले में बनारस की स्थिति किसी से छुपी नहीं है। फिर मोदी जी ने अपने संसदीय क्षेत्र में ऐसी कौन सी जादू की छड़ी घुमाई कि बनारस 200 से उपर स्थान से सीधे 36वें स्थान पर आ गया। स्पष्ट है कि राजनीतिक फायदा उठाने के लिए यह रैंकिंग हुई है।सर्वे के मुताबिक शहरों को पांच पैरामीटर्स की तर्ज पर रैंक दी गई है, ये हैं-साफ-सफाई, ठोस कचरे के निपटान, शौचालयों का निर्माण और खुले में शौच को रोकना और लोगों का बर्ताव बदलने के लिए जागरूकता अभियान चलाना।
शहरों की निकाय संस्थाओं ने इन पैरामीटर्स पर अपनी तैयारियों का डेटा सर्वेक्षण में दिया था। लेकिन कहीं भी मल को मानव द्वारा सिर पर उठाने की प्रथा को खत्म करने की बात नहीं है। निकाय संस्थाओं के दावों की जांच करने के सर्वेयर्स को तैनात किया गया था, जो खुद अपना भी निजी सर्वे कर रहे थे। फोन कॉल्स, सोशल मीडिया और डिजिटल ऐप्स के जरिए आम नागरिकों की राय ली गई। इस सर्वे का 45 प्रतिशत हिस्सा निकाय संस्थाओं के दावों पर, 25 प्रतिशत हिस्सा सर्वेयर्स के सर्वे और 30 प्रतिशत नागरिकों के द्वारा मत दिए जाने पर आधारित था।
पर्यावरण पर काम करने वाले संगठन सेंटर फॉर साइंस एंड एनवॉयरमेंट (सीएसई) का कहना है कि केंद्र द्वारा स्वच्छ शहरों को चुने जाने की प्रक्रिया को बदलने की जरूरत है। संगठन का कहना है कि हाल ही में जारी की गई इस सूची के तीन शीर्ष शहरों ने कचरा प्रबंधन के जिन तरीकों को अपनाया है वह लंबे समय तक पर्यावरण के अनुकूल नहीं है. यही नहीं, जो शहर पर्यावरण के अनुकूल कचरा प्रबंधन के तरीकों का इस्तेमाल करते हैं उन्हें स्वच्छता सूची में बहुत नीचे स्थान दिया गया है।सीएसई ने कहा है कि शहर- इंदौर, भोपाल और विशाखापत्तनम कचरे को उठाकर सीधे मलबा स्थल (लैंडफिल) पर ले जाते हैं। 
और खुले में फैले कचरे से आस पास का वातावरण दूषित हो जाता है। यानी ये शहर कचरे के निपटान के जिन तरीकों का इस्तेमाल कर रहे हैं वह पर्यावरण के अनुकूल नहीं है। यानी कि ये शहर म्यूनिसिपल सॉलिड वेस्ट (एमएसडब्लू) रूल, 2016 का पालन भी नहीं कर रहे हैं।सीएसई के अनुसार, इसके विपरीत घरेलू स्तर पर कचरे को अलग करने वाले और इसके पुन: उपयोग के लिए काम करने वाले शहरों को सर्वेक्षण में खराब रैंकिंग दी गई है। केरल के अलाप्पुझा शहर में कचरा प्रबंधन के विकेंद्रीकृत मॉडल का इस्तेमाल होता है। उसे सर्वेक्षण में 380वां स्थान दिया गया है। इसी तरह गोवा में पणजी शहर 90वें स्थान पर है, जिसने कचरा प्रबंधन के लिए सबसे बेहतर नीति अपनाई है। फिलहाल अलाप्पुझा और पणजी में कोई भी लैंडफिल साइट नहीं है। साथ ही इन शहरों में कचरे से ऊर्जा पैदा करने वाले संयंत्र भी नहीं लगे हैं।
इन शहरों के ज्यादातर कचरे का इस्तेमाल कम्पोस्ट खाद या फिर बायोगैस बनाने में होता है। लोग अमिताभ के विज्ञापन से भी सवर्ण मानसिकता से उबर नहीं पा रहे है। इसके अलावा प्लास्टिक, धातु और पेपर आदि को रिसाइक्लिंग के लिए भेज दिया जाता है। ये शहर कचरे से पैसा बना रहे हैं जबकि दूसरे शहर कचरे को इकट्ठा करने और लैंडफिल तक ले जाने के लिए करोड़ों रुपये खर्च कर रहे हैं, फिर भी इन शहरों को स्वच्छता सर्वेक्षण में बहुत नीचे स्थान दिया गया है।सीएसई ने कहा कि यह स्पष्ट है कि स्वच्छता सर्वेक्षण में जिन राज्यों मध्य प्रदेश, गुजरात और आंध्र प्रदेश को उच्च रैकिंग दी गई है, वे कचरा प्रबंधन के इन मानकों पर खरे नहीं उतरते हैं। यह इन राज्यों में शासनकर्ती पाॢटयों की प्रशंसा या फिर उसे उन राज्यों में स्थापित करने के लिए किया जा रहा है। सर्वेक्षण के शीर्ष 50 शहरों में 31 इन तीन राज्यों से है। इन सभी 31 शहरों में कचरे को सीधे ऊर्जा संयंत्रों में भेजा जा रहा है या फिर डंपिंग के लिए लैंडफिल का उपयोग किया जा रहा है।
सीएसई ने कहा कि स्वच्छता सर्वेक्षण  रेकिंग के अनुसार मुजफ्फरपुर को 2000 से कुल 782 अंक मिले हैं और इसने घरेलू स्तर पर पृथकीकरण, संग्रहण और पुनचक्रण पर आधारित ठोस अपशिष्ट प्रबंधन प्रणाली की व्यवस्था के लिए अंक हासिल कर लिए हैं। हालांकि शहर को पूरे भारतवर्ष से 434 शहरों में से 304वां स्थान मिला है। शहर के 75 प्रतिशत से अधिक रिहायशी और व्यावसायिक क्षेत्र काफी साफ-सुथरे थे। कचरे के संग्रहण के लिए वाहन पर्याप्त संख्या में थे, जिनमें से 75 प्रतिशत से अधिक वाहनों में जीपीएस सिस्टम लगा हुआ था। इस शहर में 1931 नागरिक प्रतिक्रियाओं को दर्ज किया गया र्है।  72 प्रतिशत ने कहा कि शहर पिछले साल की तुलना में अधिक साफ-सुथरा है। 55 प्रतिशत ने कहा कि बाजार के इलकों में बिखरे रहने वाले कूड़े की स्थिति में सुधार नजर आया है। 
स्वच्छ भारत के अवधारणा पर मैगसेसे पुरस्कार विजेता बेजवाड़ा विल्सन का कहना तर्कसंगत जान पड़ता है, उन्होंने कहा कि इस अभियान में सफाई कर्मियों की गरिमा की बात नहीं की गई है यानी उन्हें शूद्र के रूप में एक वर्ग की जरूरत आज भी जरूरत है। जाति व आरक्षण विरोधियों को इस पर गौर करना चाहिए। यह अभियान शौचालय के उपयोग को लेकर है न कि शौचालय की सफाई से। स्वच्छता अभियान का सूत्र है टायलेट बनाओ और जिसके तहत 2019 तक 12 करोड़ टायलेट बनाने की योजना है और अब जब चूंकि इतनी सीवरेज लाइन बिछी नहीं है लिहाजा हर टायलेट के साथ आपको सैप्टिक टैंक बनाना होगा। किसी ने यह नहीं पूछा कि यह सैप्टिक टैंक कौन साफ करेगा सेफ्टी टैंकवाली व्यवस्था के कारण पिछले साल 1357 लोगों की मृत्यु हो चुकी है।
देश में शौचालय व्यवस्था को मानवरहित करने के तकनीक का अभाव है। वे कहते हैं कि देशभर में 3 लाख सफाई कर्मियों के व्यस्थापन किए जाने हैं। यानी प्रत्येक व्यक्ति के व्यस्थापन के लिए 3 लाख की जरूरत होगी इस तरह 9 हजार करोड़ की जरूरत है। लेकिन विडंबना कहिए कि विजय माल्या अकेले 9 हजार करोड़ डकार कर विदेश फरार हो जाता है। जाने माने पत्रकार पी साईनाथ कहते हैं कि माल्या का यह आंकड़ा 10 से लेकर 12 हजार करोड़ से भी ज्यादा है। समधान हो सकता है यदि एससी/एसटी सब प्लान के मद में रखे करोड़ों रुपए से यह संभव है लेकिन कमी है तो राजनैतिक इच्छाशक्ति और सही नीति की। आप एक तरफ स्वच्छ भारत के लिए 11,300 करोड़  रुपए लगाने की बात कर रहे हैं मगर आप दूसरी तरफ देखेंगे कि हाथ से मल उठाने पर रोक लगाने के लिए या इस काम को छोडऩेवालों को वैकल्पिक रोजगार दिलाने के लिए आवंटित राशि में कटौती की जा रही है। पिछले बजट में यह राशि 570 करोड़ रुपए थी जो इस बजट में महज 10 करोड़ कर दी गई है।

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