​चरखारी को आज भी पर्यटन स्थल के नाम से जाना जाता है 


【महोबा ब्यूरो : संदीप कुमार】 

महोबा : बुन्देलखण्ड का मिनी कश्मीर चरखारी आज भी पर्यटन स्थल के नाम से पहचाना जाता है, यहां की अनमोल धरोहर आज भी देखने के लिये देशी, विदेशी लोग आते है। जरूरत है इन्हें संवारने व संरक्षण करने की हालांकि यहां के तालाब व झीलें का खुदाई कार्य सपा सरकार के शासन काल में कराया गया है, लेकिन ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण की आवश्यकता है। 

आपको बताते चले कि बुन्देलखण्ड का एक अत्यंत वैभव सम्पन्न राजसी क्षेत्र रहा है, इस बात में कोई दोराय नहीं है। चरखारी नगरी में राज महल है, इस राज महल के चारों ओर नील कमल से अच्छादित तथा एक दूसरे से आन्तरिक रूप से जुड़े विजय सागर, मलखान सागर, वंशी सागर, जय सागर, रतन सागर, कोठी ताल नामक झीले है। चरखारी नगरी में वृज का स्वरूप एवं सौन्दर्य प्रदान करते कृष्ण के 108 मंदिर है। जिसमें सुदामा पुरी का गोपाल बिहारी मंदिर, रायनपुर का गुमान बिहारी मंदिर, मंगलगढ़ के मंदिर वख्त बिहारी मंदिर, बांके बिहारी मंदिर, तथा माडव्य ऋषि की गुफा है। इसके समीप ही बुन्देला राजाओं का आखेट स्थल टोला तालाब है। यह सब मिलकर चरखारी नगरी की सुन्दरता बढ़ा रहे है।

चरखारी का प्रथम उल्लेख चन्देल नरेशों के ताम्र पत्रों में मिलता है। चन्देलों के गुजर जाने के सैकड़ों वर्ष बाद राजा छत्रसाल के पुत्र जगत राज को चरखारी के एक प्राचीन मुंडिया पर्वत पर एक प्राचीन बीजक की सहायता से चन्देलों का सोने के सिक्कों से भरा कलश मिला। यह धन पृथ्वी राज चौहान ने पराजित होने के उपरांत जब परमाल और रानी मल्हना से महोबा से कालिंजर को प्रस्थान कर रहे थे तो उन्होंने चरखारी में छुपा दिया था।छत्रसाल के निर्देश पर जगत राज ने 20 हजार कन्यादान किये, 22 विशाल तालाब बनवाये, चन्देल कालीन मंदिरो व तालाबों का जीर्णोद्धार करवाया, किन्तु इस धन का एक भी पैसा अपने पास नहीं रखा। जगत राज ने ही भूतल से 300 फुट ऊपर चक्रव्यू के आधार पर एक विशाल किले का निर्माण करवाया। जिसमें मुख्यतः तीन दरवाजे है, सूपा द्वार जिससे किले को रसद हथियार सप्लाई होते थे, डयोढ़ी दरवाजा राजा, रानी के लिये अरक्षित था, इसके अतिरिक्त एक हाथी चिघाड़ फाटक भी मौजूद था। इस विशाल दुर्ग की सुन्दरता को देखते ही आज, कल आम आदमी के लिये प्रतिबंधित कर दिया गया है। इस किले के ऊपर 7 तालाब मौजूद है, बिहारी सागर, राधा सागर, सिद्ध बाबा का कुण्ड, राम कुण्ड, चौपरा, महावीर कुण्ड, बख्त बिहारी कुण्ड, मौजूद है। चरखारी किला अपनी अष्टधातु तोपो के लिये पूरे भारत में मशहूर रहा, इसमें धरती धड़कन, काली सहांय, कड़क बिजली, सिद्ध बख्शी, गर्भगिरावन तोपें अपने नाम के अनुसार अपनी भयावहता का अहसास कराती है, इस समय यहां काली सहाय तोप ही बची है जिसकी मारक क्षमता 15 किलो मीटर बतायी जाती है। बुन्देलखण्ड का कश्मीर चरखारी आज भी ऐतिहासिक धरोहरो और मंदिरों, झीलों, के लिये जाना जाता है। यहां की धरोहरों को बचाये रखने के लिये शासन, प्रशासन के अलावा सभी को आगे आना होगा।

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