​प्रधानाध्यापिका बच्चों को सिखा रही मजदूरी करने के तरीके …

◆ खुद की गाड़ी खराब न हो इसके लिये बच्चों से डलवायी बजरा
◆ राहगीरों के टोकने पर बोली काम के बदले में दिये है 40-40 रुपये

◆ बाल अधिकार अधिनियम को भी शिक्षिका ने रखा ताक पर

उरई (जालौन) सत्येन्द्र सिंह राजावत। एक ओर जहां प्रदेश के ज्यादातर परिषदीय विद्यालयों में शिक्षा का स्तर कितना गिर चुका है इसकी जबानी तो अभिभावक खुलेआम सुनाने से नहीं चूकते हैं तो वहीं जिला मुख्यालय के जिला पंचायत कार्यालय के समीप एक ही परिसर में खुले विद्यालयों में से एक की प्रधानाध्यापिका ने तो बाल अधिकार अधिनियम की खुलेआम धज्जियां उड़ाते हुये खुद की गाड़ी में कीचड़ न लगे इसके लिये उन्होंने विद्यालयों के बच्चों के हाथों में बाल्टी थमाकर विद्यालय परिसर के बाहर डला बजरा उस स्थान पर डालने का हिटलरी फरमान सुना दिया जहां उनकी गाड़ी खड़ी होती है। जब उक्त नजारा राहगीरों ने देखा तो उन्होंने बच्चों को जैसे ही टोका तो विद्यालय परिसर से कड़कदार आबाज प्रधानाध्यापिका की आयी कि मैंने बच्चों को 40-40 रुपये मजदूरी के दिये हैं जिसे सुनकर राहगीर भी दंग रह गये।

 एक ओर जहां प्रदेश सरकार शत प्रतिशत नौनिहालों को अक्षर ज्ञान कराकर शिक्षित कराने के लिये करोड़ों रुपये का बजट खर्च करती हैं तो वहीं परिषदीय विद्यालयों में पदस्थ कुछ शिक्षक ऐसे भी हैं जिन्हें इससे कोई लेना देना नहीं रहता। ऐसा ही नजारा आज मंगलवार को जिला मुख्यालय के जिला पंचायत कार्यालय के समीप एक ही परिसर में संचालित तीन परिषदीय विद्यालयों में से एक की प्रधानाध्यापिका जो चारपहिया गाड़ी से विद्यालय में आती जाती है। चूंकि बरसाती सीजन में उक्त विद्यालय में जलभराव होता है जिससे विद्यालय परिसर गंदगी से भरापूरा रहता है। इसी गंदगी से बच्चे आते-जाते रहते हैं। लेकिन जो प्रधानाध्यापिका चारपहिया गाड़ी से विद्यालय में आती है और उनकी गाड़ी विद्यालय परिसर के अंदर ही खड़ी होती है वह कीचड़ से गंदी न हो इसके लिये उन्होंने अपने ही विद्यालय के बच्चों के हाथों में बाल्टी थमा दी और फरमान सुनाया कि विद्यालय परिसर के बाहर डला बजरा बाल्टी में भरकर जिस स्थान पर उनकी गाड़ी खड़ी रहती है वहां पर डालने का फरमान सुनाया तो बच्चे बगैर सोचे समझे बाल्टी में बजरा भरकर बताये गये स्थान पर डालने में जुट गये। जब उक्त नजारा वहां से निकलते कुछ राहगीरों ने देखा तो उनके पैर वहीं पर ठिठक गये और बच्चों द्वारा बाल्टी में भरकर ले जाये जा रहे बजरा के बारे में बातचीत करनी चाही तो विद्यालय गेट के समीप खड़ी प्रधानाध्यापिका की कड़कती आवाज आयी कि मैंने बजरा डालने वाले बच्चों को 40-40 रुपये मजदूरी के दिये हैं जिससे वह अपना काम कर रहे हैं। प्रधानाध्यापिका के शब्दों को सुनकर राहगीर दंग रह गये और वह यह नहीं समझ पाये कि अभिभावक अपने बच्चों को परिषदीय विद्यालय में पढ़ने के लिये भेजते हैं या फिर उन्हें मजदूरी के गुर सीखने के लिये। इस बात का जबाब तो शिक्षा महकमे के अधिकारियों के पास भी न होगा। क्योंकि उन्हें तो बाल संरक्षण अधिनियम के बारे में अच्छी तरह से पता होगा।

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