अपने अस्तित्व को खोता जा रहा महाराजा मर्दन सिंह का किला,हुआ खण्डहर में तब्दील …

टीकमगढ से ललितपुर जाने के लिये बानपुर का मार्ग पर स्थित है यह किला जो आज संरक्षण के अभाव में खण्डहर में बदलता जा रहा। इस ओर नहीं है पुरातत्व विभाग का ध्यान।

बादलों से घिरी शाम की धुधली रोशनी मे दिखाई देता बानपुर का खंडहर किला छोटी सी पहाड़ी पर अब भी शान से खड़ा है। उसकी सबसे ऊंची मीनार मानो उसका गर्वोत्तर सिर हो 

1857 मे आजादी की पहली लडाई मे बानपुर नरेश महाराज मर्दन सिह के भी तलवार उठाई थी। ललितपुर और  म.प्र. का आसपास का इलाका अंग्रेजी राज से मुक्त करवा लिया । अंग्रेज कलक्टर अपने अमले के साथ झांसी भाग गया । राजा बखतबली के अलावा कोई भी राजा , मर्दन सिह जी के साथ नहीं आया । 
झांसी की रानी ने बाद मे विद्रोह किया। झांसी भी स्वतन्त्र हो गई। अंग्रेज सेनापति ह्यूम रोज महू स्थिति छावनी से चलकर विद्रोह को कुचलता हुआ सागर मदनपुर मार्ग से सोर ई, मडावरा ,महरौनी  होते हये बानपुर पहुंचा और किले को तोपो से उडवाया दिया । बुन्देलखणड के पहले बिद्रोह की सजा ! झांसी की रानी के साथ अंग्रेजों से लडते हुये मर्दननसिह जंगलों मे भटकते हुये  ग्वालियर के पास अंग्रेजों द्वारा बंदी बनाकर लाहौर के किले मे भेज दिये गये। जीवन का अंत 1875  (लगभग) मे मथुरा मे  हुआ । उनका राज्य और सम्पति जब्त हो गया । परिवार जनो को ल लितपुर की सीमा मे आने पर रोक लगा दी गई। उनके वंशज आज भी यहां नही है।

दुर्गंध व शौचालय में तब्दील हुआ किला :

अंग्रेजी तोपो से घायल, रक्तरंजित, यह किला अब भी सिर ऊंचा किये खडा है। आजादी की कुर्बानियों की यह कैसी गाथा है जिसमे इस किले और आसपास के इलाके को लोग शौच के लिये उपयोग कर रहे है। अवारा पशुओ और आदमियों का आश्रय है। दुर्गंध से नजदीक भी नही जा सकते।

1857 की लडाई की 150 वी वर्ष गांठ पर  ऐसी ही दुर्गंध और गंदगी के बीच हमने एक शाम यहां दिये जलाये थे। ऊची पहाडी पर हवा तेज थी और दिये बुझ बुझ जा रहेथे । शायद स्वाभिमानी किले को अपनी अहसान फरामोश सन्तानों से श्रद्धा जंलि मंजूर नही थी । 

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